गोपेश्वर (चमोली)। पिछले कुछ दिनों से मौसम का मिजाज बदलने से हिमालयी चोटिंयों का नख श्रृंगार लौट आया है। इसके चलते लोग मौसम की इस मेहरबानी को भविष्य के लिए सुकुन के रूप में देखने लगे हैं। दरअसल बीते साल अक्टूबर माह से मौसम की बेरूखी के चलते हिमालयी चोटिंया बर्फ विहीन होकर रह गई थी। इसके चलते लोगों को भविष्य की चिंता सताने लगी थी। शीतकाल के दौर में 15 मार्च तक हिमालयी क्षेत्रों में बर्फवारी न होने से लोग भविष्य को लेकर लोग चिंता में डूबने लगे थे। इस दौर में बारीश भी एक तरह से गायब सी हो गई थी। इसके चलते हिमालयी पहाड़ियों पर हिमपात न होने से इस बार हिमालयी चोटियों का बर्फीला श्रृंगार ही गायब हो चला था और लोग मायूस होकर रह गए थे। गुजरे 2025 के साल में भी मौसम लगातार रंग दिखाता रहा। इस दौर में शुरूआत से ही बारिश होती रही। गर्मियों के सीजन में भी लोग वातावरण के गर्म हो जाने से मुश्किल में घिरे रहे। मानसून का दौर आया तो धराली, थराली, नंदानगर तथा देहरादून में बारिश ने कोहराम मचाया। इसके चलते कई लोग अकाल मौत के शिकार हुए तो वर्षों से खड़ी की गई परिसंपत्तियां भी एक झटके में मलबे में तब्दील हुई। हालांकि अन्य इलाकों में भी बारिश ने कहर बरपाया। बारिश का यह दौर जुलाई से लेकर अक्टूबर माह तक चलता रहा। बारिश से लोगों ने किसी तरह निजात पाई तो अक्टूबर के बाद मौजूदा 14 मार्च तक मौसम का मिजाज बदला नहीं। इसके चलते बारिश और बर्फवारी न होने के चलते पहाड़ी चोटियां बर्फ विहीन होकर रह गई है और बारिश की आमद न होने से फसलें भी बुरी तरह प्रभावित होकर रह गई है। ठंड ने इस तरह कहर बरपाया कि लोगों का जीवन मुश्किलों में घिरा रहा। कोरी ठंड के चलते आम से लेकर खास तक लोग बर्फवारी तथा बारिश न होने के चलते हैरान परेशान होते रहे।

बीते 15 मार्च को मौसम ने यकायक करवट बदली और बारिश तथा बर्फवारी के चलते हिमालयी चोटिंयों का नथ श्रृंगार एक तरह से लौट आया। यह सिलसिला अब तक जारी है। हर रोज हिमालयी क्षेत्रों में बर्फवारी और घाटी वाले क्षेत्रों में बारिश से ठंड भी लौट आई है। पिछले कुछ दिन लोग गर्मी के चलते गर्म कपड़े भी उतार गए थे। अब फिर पहाड़ों में गर्म कपड़ों के बिना ठंड से निजात नहीं मिल पा रही है। मौसम की इस तरह की मेहरबानी से भविष्य में पेयजल संकट से निजात मिलने की उम्मींदे जग गई है। इसी तरह इस साल अब बर्फवारी से ग्रीष्मकाल में गर्मी का असर विकराल रूप में नहीं दिखाई देगा। इसे सुखद संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

वैसे समूची दुनिया बीते कई सालों से ग्लोबल वार्मिंग के खतरों से जूझ रही है। एक तरह से कहा जा सकता है कि ऋतु परिवर्तन भी इस दौर में होते दिखाई दे रहा है। एक दौर में पहाड़ दैवीय आपदाओं को लेकर शीतकाल में सुरक्षित माने जाते रहे हैं। वर्ष 2013 के 16-17 जून को ग्रीष्मकाल के दौरान केदारनाथ त्रासदी में असंख्य जाने गई थी। इस आपदा ने निजी तथा सरकारी परिसंपत्तियों को तहस-नहस कर रख दिया था। आपदा का कहर केदारनाथ ही नहीं अपितु चमोली जिले के पिंडर घाटी समेत बदरीनाथ घाटी पर भी कहर बरपाया था। यह सिलसिला तब से अब तक जारी है। ग्रीष्मकाल में भी मौसमीय बदलाव के कारण ग्रीष्मकाल अथवा शीतकाल में भी तमाम तरह की दैवीय आपदाएं लोगों को झकझोर रही हैं।

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