शिक्षा का बाज़ारीकरण और अभिभावकों की विवशता
आज के दौर में शिक्षा एक सेवा कम और व्यवसाय अधिक नज़र आने लगी है। स्कूलों द्वारा फीस में सालाना बेतहाशा वृद्धि तो एक समस्या है ही, लेकिन उससे भी बड़ी समस्या है ‘छिपे हुए खर्च’ 
चुनिंदा विक्रेताओं का एकाधिकार: अधिकांश निजी स्कूल अभिभावकों को विशेष दुकानों से ही ड्रेस और किताबें खरीदने के लिए मजबूर करते हैं।इन दुकानों पर मिलने वाली सामग्री की कीमतें खुले बाज़ार की तुलना में 30% से 50% तक अधिक होती हैं।
कमीशन का खेल: यह स्पष्ट है कि स्कूलों और इन खास विक्रेताओं के बीच एक व्यापारिक गठजोड़ होता है, जिसका सीधा आर्थिक बोझ एक आम मध्यमवर्गीय परिवार पर पड़ता है।
विकल्पों का अभाव: हर साल किताबों के सेट बदल दिए जाते हैं ताकि पुरानी किताबों का उपयोग न किया जा सके, जिससे अभिभावकों के पास नई और महंगी किताबें खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
मध्यम वर्ग पर दबाव आमदनी सीमित होने और महंगाई बढ़ने के कारण अभिभावकों के लिए बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना एक चुनौती बन गया है।
विकल्पों की कमी सरकारी स्कूलों की स्थिति हर जगह समान नहीं है, जिससे लोग निजी स्कूलों की ओर जाने को मजबूर हैं।
फीस की सीमा तय हो सरकार को स्कूलों की श्रेणी के आधार पर फीस की एक ऊपरी सीमा तय करनी चाहिए, जिससे कोई भी स्कूल मनमानी वसूली न कर सके।
सरकार को चाहिए कि वह स्कूलों को किसी खास दुकान से ड्रेस या किताबें खरीदने के लिए मजबूर करने को ‘गैर-कानूनी’ घोषित करे। अभिभावकों को खुली छूट मिलनी चाहिए कि वे कहीं से भी गुणवत्तापूर्ण सामान खरीद सकें।
सशक्त शिकायत निवारण प्रणाली: प्रत्येक जिले में एक ऐसी हेल्पलाइन या पोर्टल होना चाहिए जहाँ अभिभावक बिना किसी डर के स्कूलों की मनमानी की शिकायत कर सकें और उस पर त्वरित कार्रवाई हो।
शिक्षा का उद्देश्य समाज का बौद्धिक विकास होना चाहिए, न कि परिवारों का आर्थिक शोषण।
सरकारी स्कूलों का कायाकल्प: निजी स्कूलों की मनमानी रोकने का सबसे स्थायी तरीका सरकारी स्कूलों के स्तर को इतना ऊंचा उठाना है कि वे प्रतिस्पर्धा दे सकें। जब सरकारी स्कूल बेहतर होंगे, तो अभिभावकों के पास मजबूत विकल्प मौजूद होंगे।
स्वतंत्र ऑडिट और जवाबदेही: सरकार को एक ऐसी स्वतंत्र समिति का गठन करना चाहिए जो स्कूलों के वार्षिक बजट का ऑडिट करे। यदि कोई स्कूल बिना उचित कारण के फीस बढ़ाता है या किसी खास दुकान से सामान खरीदने का दबाव डालता है, तो उसकी मान्यता रद्द करने जैसे कड़े प्रावधान होने चाहिए।
समान शिक्षा नीति का क्रियान्वयन: सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी स्कूलों में एनसीईआरटी (NCERT) की किताबें ही अनिवार्य हों, ताकि निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों के नाम पर होने वाली कमीशनखोरी बंद हो सके।
