हरिद्वार : हर वर्ष जब हम विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाते हैं, तब यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अवसर होता है यह विचार करने का कि हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में कहाँ खड़े हैं और किस दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। वर्तमान समय में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था एक सकारात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है — और इस परिवर्तन का मुख्य आधार है वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों, विशेषतः आयुर्वेद और होम्योपैथी की ओर जनता का बढ़ता विश्वास। “यह केवल झुकाव नहीं, अनुभवजन्य विश्वास है जो लाखों रोगियों ने आयुर्वेदिक चिकित्सा से राहत पाकर अर्जित किया है,” डॉ. अवनीश उपाध्याय का कहना है।
बीते कुछ वर्षों में भारत सरकार द्वारा आयुष मंत्रालय के माध्यम से किए गए प्रयासों का प्रत्यक्ष परिणाम यह है कि आज देशभर में आयुष चिकित्सालयों में रोगियों की संख्या में 300% तक की वृद्धि देखी जा रही है। जहाँ पहले छोटे आयुर्वेदिक अस्पतालों में प्रतिदिन 30-50 मरीज आते थे, आज यह संख्या कई स्थानों पर 300-500 तक पहुँच चुकी है। यह बदलाव मात्र आकड़े नहीं हैं, यह उस पुनर्जागरण का संकेत हैं जिसमें भारतीय जनमानस अब आधुनिकता के साथ अपनी परंपराओं को पुनः अंगीकार कर रहा है।
डॉ. उपाध्याय बताते हैं, “हमारे पास जो रोगी आते हैं, उनमें अधिकांश पहले आधुनिक चिकित्सा से थक-हार चुके होते हैं। जब वे आयुर्वेद की शुद्ध औषधियाँ, अनुकूलित आहार-विहार और सहज दिनचर्या को अपनाते हैं, तो उनमें न केवल रोग से मुक्ति मिलती है, बल्कि सम्पूर्ण जीवनशैली में सुधार होता है। यह आयुर्वेद की विशेषता है कि यह व्यक्ति के ‘स्वास्थ्य’ को पुनर्स्थापित करता है, केवल रोग का दमन नहीं करता।”
होम्योपैथी की ओर भी लोगों का आकर्षण बढ़ा है, विशेषकर उन रोगों में जहाँ दीर्घकालिक, साइड इफेक्ट रहित इलाज की आवश्यकता होती है। छोटे-छोटे डोज़ में बड़ी राहत देना इस पद्धति की विशेषता है। लेकिन सबसे अहम बात यह है कि जनता अब विकल्पों को गंभीरता से देख रही है — और यही है स्वस्थ समाज की पहचान। आयुर्वेद में स्वास्थ्य का अर्थ केवल ‘रोग की अनुपस्थिति’ नहीं, बल्कि शरीर, मन, आत्मा और इंद्रियों की संतुलित स्थिति है। यह दृष्टिकोण समग्र (holistic) है और इसीलिए इसकी लोकप्रियता अब केवल भारत में ही नहीं, विदेशों में भी निरंतर बढ़ रही है।
डॉ. अवनीश उपाध्याय कहते हैं, “यदि हम आयुर्वेदिक चिकित्सकों के रूप में अपने ज्ञान में निरंतर वृद्धि करते रहें, युक्तिपूर्वक निदान करें और रोगी को पूरी संवेदना से समझें, तो हमें कोई रोक नहीं सकता। रोगी की संतुष्टि ही हमारी सच्ची पहचान होनी चाहिए।” अब आवश्यकता है कि इस जनविश्वास को केवल भावनात्मक नहीं, वैज्ञानिक आधार भी दिया जाए। शोध कार्यों, केस स्टडीज़ और आधुनिक परीक्षण पद्धतियों से आयुर्वेद की प्रमाणिकता को सुदृढ़ करना समय की आवश्यकता है। साथ ही युवाओं को इस दिशा में प्रेरित करना होगा कि वे केवल डिग्री के लिए नहीं, सेवा के भाव से इस चिकित्सा पद्धति से जुड़ें।
“हमारा उद्देश्य केवल रोगियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की गुणवत्ता को सशक्त बनाना है। और आयुर्वेद इसके लिए एक उत्कृष्ट माध्यम है,” डॉ. उपाध्याय जोर देते हैं।

इस विश्व स्वास्थ्य दिवस पर यह संदेश दिया जाना चाहिए कि

  •  “हम स्वास्थ्य के लिए फिर से प्रकृति की ओर लौटें।”
  • “हम परंपरागत ज्ञान को आधुनिकता से जोड़ें।”
  • “और सबसे महत्वपूर्ण – रोग से पहले ‘रोगी’ को समझें।”
  • आइए, मिलकर एक स्वस्थ, संतुलित और संस्कारित भारत की नींव रखें – आयुर्वेद के साथ।

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