• बूढ़ा केदार : टिहरी गढ़वाल की आध्यात्मिक धरोहर – पंच केदार परंपरा का प्राचीन तीर्थ

टिहरी : उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद के भिलंगना विकासखंड में बालगंगा और धर्मगंगा नदियों के पवित्र संगम पर स्थित बूढ़ा केदार मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। पंच केदार परंपरा के प्राचीन तीर्थों में गिने जाने वाले इस पावन धाम को भगवान शिव के वृद्ध स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है। आध्यात्मिक महत्व, पौराणिक मान्यताओं, प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण बूढ़ा केदार आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

पौराणिक मान्यता से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत ने बताया कि स्कन्द पुराण के छठवें अध्याय के अनुसार बूढ़ा केदार का इतिहास इस क्षेत्र के कई अन्य प्रसिद्ध केदारनाथ तीर्थों से भी पुराना है। इस मंदिर की यात्रा किए बिना चारों धाम की यात्रा सफल नहीं मानी जाती है। बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत के अनुसार स्कंद पुराण में वर्णित कथाओं के आधार पर इस तीर्थ का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है।  महाभारत युद्ध के बाद ब्रह्म और गोत्र के हत्या के पापों से मुक्ति पाने के लिए अपने गुरू वेदव्यास से मुक्ति का मार्ग पूछा तथा गुरू वेदव्यास ने पांडवों से कहा उत्तर हिमालय की दिशा में भगवान शिव के दर्शन से गोत्र हत्या के पापों से मुक्ति मिल जाएगी। पांडव भगवान शिव का आर्शीवाद खोजते हुए हिमालय आए थे। भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देने से बचने के लिए एक वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण किया था। जब पांडव इस स्थान पर पहुँचे, तो वह वृद्ध व्यक्ति ध्यान में लीन हो गया और अचानक एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ। यहीं पर पाडवों ने शिवलिंग के रूप में शिव जी के दर्शन किए, जिसके कारण इस जगह का नाम बूढ़ा केदार पड़ा।

प्राकृतिक शिवलिंग और अनूठी परंपराएं

मंदिर समिति अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि यहां स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग उत्तर भारत के सबसे बड़े प्राकृतिक शिवलिंगों में से एक माना जाता है। शिवलिंग में भगवान शिव, गणेश, नंदी, पांचों पांडवों तथा द्रौपदी की आकृतियां उकेरी हुई दिखाई देती हैं। मंदिर पारंपरिक गढ़वाली वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो अपने उत्कृष्ट शिल्प कौशल और नक्काशीदार लकड़ी और पत्थर के जटिल संयोजन के लिए जाना जाता है। जिसमें लकड़ी और पत्थर की सुंदर नक्काशी विशेष आकर्षण का केंद्र है।

मंदिर परिसर में नाथ संप्रदाय के संतों की समाधियां भी स्थित हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार महान योगी गुरु गोरखनाथ ने भी यहां तपस्या की थी। इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि यहां पुजारी का दायित्व राजपूत समुदाय के वे लोग निभाते हैं, जिन्होंने नाथ संप्रदाय की परंपरागत शिक्षा प्राप्त की होती है।  मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी स्थापित हैं।

प्रकृति की गोद में बसा है पावन धाम

समुद्र तल से लगभग 1,535 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बूढ़ा केदार नई टिहरी से करीब 90 किलोमीटर दूर घनसाली क्षेत्र में स्थित है। देवदार के घने जंगलों, सीढ़ीनुमा खेतों और पर्वतीय प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह क्षेत्र आध्यात्मिक शांति और सुकून का अनुभव कराता है। 

मेलों और उत्सवों में उमड़ती है आस्था

महाशिवरात्रि बूढ़ा केदार का सबसे प्रमुख पर्व है, जिसमें हजारों श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा जुलाई माह की पूर्णिमा से आरंभ होने वाला तीन दिवसीय मेला भी क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक आयोजन माना जाता है। गुरु कैलापीर देवता, जिन्हें लगभग 180 गांवों का इष्ट देवता माना जाता है, का भव्य मेला भी दीपावली के लगभग एक माह बाद बड़े उत्साह के साथ आयोजित किया जाता है। 

ऐसे पहुंच सकते हैं बूढ़ा केदार

ऋषिकेश और नई टिहरी से घनसाली के लिए नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। घनसाली से निजी वाहन या टैक्सी के माध्यम से मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। अंतिम चरण में बूढ़ा केदार सड़क पर स्थित लोहे के पुल से लगभग एक किलोमीटर का सुगम और मनोहारी पैदल मार्ग तय करना पड़ता है। जो आसान और मनोरम ट्रेक है। मार्च से जून तथा सितंबर से नवंबर तक का समय यहां भ्रमण के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस अवधि में मौसम सुहावना रहता है और गढ़वाल हिमालय के मनोरम दृश्य यात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। बूढ़ा केदार महासर ताल, सहस्त्रताल, जराल ताल और मनझार ताल जैसे प्रसिद्ध उच्च हिमालयी तालों की ट्रैकिंग का भी प्रमुख प्रवेश द्वार है।

स्मृतियों में जीवित रहेंगे रावल अमरनाथ योगी

बूढ़ा केदार की हमारी यात्रा के दौरान हमें रावल अमरनाथ योगी से साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिन्होंने बूढ़ा केदार मंदिर के इतिहास, पौराणिक महत्व और परंपराओं के विषय में अत्यंत सरल और गहन जानकारी साझा की। उनके शब्दों में इस पावन धाम की आस्था और अध्यात्म की जीवंत झलक स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती थी। यह भेंट न केवल जानकारीपूर्ण रही, बल्कि इस दिव्य स्थल की सांस्कृतिक आत्मा को समझने का एक सशक्त माध्यम भी बनी। दुर्भाग्यवश, हाल ही में उनके स्वर्गवास का समाचार प्राप्त हुआ, जिससे यह स्मृति और भी अधिक भावुक एवं अविस्मरणीय हो गई है। बूढ़ा केदार की यह यात्रा आज भी उनकी स्मृतियों और मार्गदर्शन के प्रकाश में जीवंत प्रतीत होती है।

आस्था और विरासत का जीवंत प्रतीक

बूढ़ा केदार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है। यहां आकर श्रद्धालु जहां आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं, वहीं इतिहास, परंपरा और प्रकृति के अद्भुत संगम से भी रूबरू होते हैं।

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