गोपेश्वर (चमोली)। जिस सड़क के लिए सकंड गांव के ग्रामीण दशकों से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे, उसी सड़क को जब ग्रामीणों ने खुद खोद दिया तो पांच दिन में प्रशासन को गांव की चैखट पर पहुंचना पड़ा। आंदोलन के दबाव में प्रशासन, वन विभाग और लोक निर्माण विभाग ने ग्रामीणों के साथ लिखित समझौता किया। भाकपा (माले) ने इसे ग्रामीणों के संघर्ष की जीत बताया है।

भाकपा (माले) के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी ने कहा कि सकंड के ग्रामीणों का संघर्ष सरकार के विकास के दावों की जमीनी हकीकत सामने लाता है। दशकों बाद भी सड़क के प्रथम चरण की स्वीकृति नहीं होना बताता है कि ग्रामीण इलाकों के प्रति शासन-प्रशासन की प्राथमिकता क्या है। लिखित समझौते में विभागों ने कहा है कि प्रथम चरण की स्वीकृति मिलते ही वन भूमि हस्तांतरण का प्रस्ताव मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

मैखुरी ने सवाल उठाया कि स्थानीय भाजपा विधायक का यह तीसरा कार्यकाल है और राज्य में भाजपा सरकार को करीब दस साल हो चुके हैं, फिर भी सकंड के ग्रामीणों को सड़क के लिए खुद सड़क खोदकर आंदोलन करने को मजबूर होना पड़ा।

उन्होंने कहा कि बड़े प्रोजेक्टों के लिए हजारों पेड़ों की कटाई और वन भूमि के इस्तेमाल का रास्ता निकाला जा सकता है, लेकिन गांव तक सड़क पहुंचाने की बारी आती है तो वन भूमि और चंद पेड़ों की आड़ में वर्षों तक ग्रामीणों को सड़क से वंचित रखा जाता है। सरकारों का यह दोहरा रवैया अब नहीं चल सकता। भाकपा (माले) ने सकंड समेत सड़क से वंचित सभी गांवों को तत्काल सड़क से जोड़ने और वन भूमि समेत तमाम विभागीय अड़चनों को दूर करने की मांग की है।

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