नई दिल्ली:
राजधानी दिल्ली की सड़कों पर पिछले 25 दिनों से लगातार जारी छात्रों का विरोध-प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। कड़ाके की धूप और बारिश की परवाह किए बिना सैकड़ों छात्र अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों का साफ तौर पर कहना है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, तब तक यह आंदोलन समाप्त नहीं होगा।
जनमत का अपमान या संवाद की कमी?
आंदोलन कर रहे युवाओं और उनके समर्थकों में सरकार के रवैये को लेकर भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि जिस जनता और युवाओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री और धर्मेंद्र प्रधान को देश के शिक्षा मंत्री के रूप में चुना, आज वही सरकार उनकी आवाज़ सुनने से इनकार कर रही है।
”हमने जिस उम्मीद के साथ इस सरकार को चुनकर सत्ता की चाबी सौंपी थी, आज वही सरकार हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। 25 दिनों से छात्र सड़क पर हैं, लेकिन शिक्षा मंत्री की ओर से कोई ठोस समाधान निकालना तो दूर, संवाद तक की कोशिश नहीं की जा रही।”
— एक प्रदर्शनकारी छात्र
आंदोलन की मुख्य वजहें और छात्रों के सवाल
छात्रों के इस उग्र प्रदर्शन के पीछे कई गंभीर मुद्दे शामिल हैं:
परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ी: प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में लगातार हो रही कथित धांधली और पेपर लीक की घटनाओं से युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया है।
जवाबदेही तय करने की मांग: छात्रों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए।
जनता से दूरी: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है, लेकिन वर्तमान में सरकार जनहित के बजाय अपने फैसलों को थोपने का काम कर रही है।
आगे क्या होगी आंदोलन की दिशा?
25 दिन बीत जाने के बावजूद सरकार और छात्रों के बीच गतिरोध बना हुआ है। छात्रों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यह आंदोलन केवल दिल्ली तक सीमित न रहकर पूरे देश में फैलाया जाएगा।
अब देखना यह होगा कि क्या सरकार छात्रों के इस बढ़ते दबाव के आगे झुकते हुए कोई बड़ा कदम उठाती है या फिर यह राजनीतिक घमासान और लंबा खिंचेगा।
