हरिद्वार। तीर्थ नगरी के हृदय स्थल मालवीय द्वीप और विश्वप्रसिद्ध घंटाघर समेत अन्य प्रमुख घाटों पर फूल और पूजन सामग्री बेचने (फूल-फरौशी) के ठेकों में एक बड़े घोटाले की गूंज सुनाई दे रही है। कांग्रेस के पूर्व पार्षद कैलाश भट्ट ने नगर निगम प्रशासन पर अपने ‘चहेते ठेकेदारों’ को सीधा फायदा पहुंचाने और निगम के खजाने को भारी नुकसान पहुंचाने के सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। प्रेस क्लब में आयोजित एक पत्रकारवार्ता के दौरान उन्होंने वर्ष 2010 से लेकर वर्तमान (2026) तक के सभी ठेकों की उच्चस्तरीय जांच कराने और जिम्मेदार ठेकेदारों से राजस्व के नुकसान की पूरी भरपाई (वसूली) करने की तीखी मांग की है।
शिकायतों का ‘रिपोर्ट कार्ड’: आखिर कहां और कैसे हुई धांधली?
पूर्व पार्षद कैलाश भट्ट ने दस्तावेजों के आधार पर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
1. सूचना छिपाने का खेल: RTI और सूचना आयोग तक से आंख-मिचौली
वर्ष 2010 से अब तक जितने भी फूल-फरौशी के ठेके दिए गए, उनसे कितना राजस्व मिला और प्रक्रिया क्या रही—इसकी स्पष्ट जानकारी मांगने के लिए RTI का सहारा लिया गया। मामला उत्तराखंड सूचना आयोग तक जा पहुंचा, लेकिन इसके बावजूद नगर निगम प्रशासन द्वारा गोलमोल रवैया अपनाते हुए अपेक्षित जानकारी को दबाने की पूरी कोशिश की गई।
2. ई-निविदा (E-Tender) में 22 दिनों का रहस्यमयी सस्पेंस!
वर्ष 2026 में ठेकों की अवधि समाप्त होने के बाद अपनाई गई ई-निविदा प्रक्रिया में भारी पारदर्शिता का अभाव दिखा:
7 मई 2026: नगर निगम ने ई-निविदाएं आमंत्रित कीं।
28 मई 2026: निविदाओं की स्थिति सार्वजनिक की गई।
लंबी खामोशी (22 दिन का इंतजार): इसके बाद अधिकारियों को बार-बार पत्र देने के बावजूद तकनीकी (Technical) और वित्तीय (Financial) बिड नहीं खोली गईं।
19 जून 2026: लगभग 22 दिनों की रहस्यमयी देरी के बाद जब आखिरकार बिड खोली गईं, तो कुछ टेंडर दो-दो बिड के साथ पाए गए। आरोप है कि यह 22 दिनों की देरी केवल ‘अपने प्रिय ठेकेदारों’ को साठगांठ का समय देने और उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए की गई थी।
3. नियमों की धज्जियां और आर्थिक मेहरबानी
बिना पैसा जमा किए मिला ठेका: आरोप है कि कुछ ठेकेदारों ने निर्धारित धनराशि जमा तक नहीं की, फिर भी उन्हें ठेका सौंप दिया गया।
नियमों में मनमाना बदलाव: पूर्व में ठेकेदारों को 25% राशि जमा करनी होती थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 40% और चार माह का अग्रिम भुगतान किया गया। लेकिन इन नियमों का इस्तेमाल भी चुनिंदा ठेकेदारों को राहत या दबाव देने के लिए अपनी सहूलियत के हिसाब से किया गया।
एक ही चेहरा, नाम अनेक: एक ही ठेकेदार अलग-अलग फर्जी या छद्म (Dummy) नामों से बोलियां लगाकर ठेका हथियाने की प्रक्रिया में बार-बार शामिल होता रहा, जिसे निगम ने नजरअंदाज किया।
4. अतिक्रमण और समानांतर दुकानें: दोहरा नुकसान
कुंभ या अत्यधिक भीड़भाड़ वाले सीजन के दौरान ठेकेदारों को तय सीमा से बाहर जाकर अवैध रूप से खोखे और दुकानें लगाने की खुली छूट दी गई। इससे न केवल घाटों पर अतिक्रमण बढ़ा, बल्कि नगर निगम को मिलने वाले जायज राजस्व पर भी डाका डाला गया।
मुख्य मांगें: क्या होना चाहिए अगला कदम?
”2010 से लेकर अब तक के सभी ठेकों की निष्पक्ष जांच हो! जिन ठेकेदारों ने नियमों की धज्जियां उड़ाकर निगम के खजाने को चपत लगाई है, उनसे एक-एक रुपये की रिकवरी की जाए और अतिक्रमण पर पूरी तरह रोक लगे।”
— कैलाश भट्ट, पूर्व पार्षद
पत्रकारवार्ता में दर्ज हुई मौजूदगी
निगम प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इस पत्रकारवार्ता में पूर्व पार्षद कैलाश भट्ट के साथ पार्षद हिमांशु गुप्ता, ऋषभ वशिष्ठ, शिवम गिरी, तरुण व्यास, शुभम जोशी, अनिकेत गिरी और शानू गिरी प्रमुख रूप से मौजूद रहे और इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
ये सभी आरोप शिकायत करता द्वारा लगाए गए हैं इनकी पुष्टि होना और नगर निगम प्रशासन का पक्ष आना अभी बाकी है।
