जयपुर। “मेरी छाती का एक हिस्सा बुरी तरह झुलस गया है। मेरी अभी शादी भी नहीं हुई है, मेरा आने वाला भविष्य कैसा होगा, इसकी कल्पना करके भी मेरी रूह कांप जाती है।” यह दर्दनाक दास्तां 27 वर्षीय रेशु गुप्ता की है, जो जयपुर के जगतपुरा (महल रोड) पर मोमोज का ठेला लगाकर अपने परिवार का पेट पालती हैं। 19 जून की शाम को मुख्यमंत्री के काफिले के आने से पहले पुलिस की बर्बरता ने इस मासूम लड़की के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया।

​खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री के रूट को ‘क्लीयर’ कराने आई पुलिस ने स्टीमर में खौलता पानी होने की चेतावनी के बावजूद ठेले को बेरहमी से धक्का मार दिया, जिससे उबलता पानी रेशु पर गिर गया। 22 जून को इस मामले की एफआईआर दर्ज कराई गई है।

​लोकतंत्र में मुख्यमंत्री: जनता का सेवक या तानाशाह?

​यह घटना सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे लोकतंत्र की दिशा क्या है? संविधान के अनुसार, देश का प्रधानमंत्री हो या राज्य का मुख्यमंत्री, वह जनता द्वारा चुना गया एक प्रतिनिधि और जनता का सेवक होता है। जनता के टैक्स के पैसों से ही उनकी सुरक्षा और काफिले का खर्च चलता है।

​लेकिन आज स्थिति यह हो गई है कि जब भी किसी वीआईपी का काफिला निकलता है, तो ऐसा लगता है जैसे किसी राजा की सवारी निकल रही हो। ऐसी भी क्या आफत आ गई कि सड़क किनारे ईमानदारी से मेहनत कर दो वक्त की रोटी कमाने वाले रेहड़ी-पटरी वालों की ठेलियां पलट दी जाएं? क्या एक वीआईपी के चंद मिनटों के सफर की कीमत किसी गरीब की जिंदगी और उसके भविष्य से बढ़कर है?

​भारत बनाम विदेश: वीआईपी संस्कृति का यह कैसा मोह?

​भारत में वीआईपी कल्चर इस कदर हावी है कि किसी बड़े नेता के आने पर आम जनता को भीषण धूप में घंटों सड़कों पर रोक दिया जाता है। एम्बुलेंस फंसी रहती हैं, दफ्तर जाने वाले परेशान होते हैं और पुलिस प्रशासन आम नागरिकों को कीड़े-मकौड़ों की तरह हटाता है।

​इसके विपरीत, विकसित देशों (जैसे ब्रिटेन, स्वीडन या नीदरलैंड) में स्थिति बिल्कुल अलग है। वहां के प्रधानमंत्री या राष्ट्राध्यक्ष अक्सर आम ट्रैफिक के बीच से गुजरते हैं। कई बार तो वे साइकिल या मेट्रो से सफर करते हैं। वहां किसी आम नागरिक का रास्ता नहीं रोका जाता, क्योंकि वे जानते हैं कि देश का असली मालिक आम नागरिक है।

​जागने का वक्त: कब खत्म होगी यह सामंती सोच?

​हर जगह यही ढर्रा चल रहा है कि नेताओं की सुरक्षा के नाम पर आम जनता को प्रताड़ित किया जाता है। जयपुर की घटना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर ग्राउंड लेवल के पुलिसकर्मी अमानवीयता की हदें पार कर जाते हैं।

​बड़ा सवाल यह है:

​क्या मुख्यमंत्री का काफिला किसी की रोजी-रोटी और जान से ज्यादा कीमती है?

​क्या जनता के सेवक को सुरक्षित निकालने के लिए जनता का ही खून बहाना जायज है?

​अब समय आ गया है कि भारत के नागरिक और खुद सरकारें इस सामंती मानसिकता को बदलें। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम तकनीक और बेहतर प्रबंधन से होने चाहिए, न कि गरीबों के ठेले पलटकर या किसी बेटी को जीवनभर का दर्द देकर। लोकतंत्र तभी बचेगा जब ‘लोक’ (जनता) को ‘तंत्र’ (व्यवस्था) से ज्यादा सम्मान मिलेगा।

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