भारत के जाने-माने शिक्षाविद और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट-यूजी पेपर लीक विवाद और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांगों को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के समर्थन में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे हैं। उनके अनशन को 18 दिन हो चुके हैं, उनका वजन लगभग 9 किलो गिर चुका है और स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सरकार से उनके स्वास्थ्य को लेकर जवाब मांगा है। 

​इस संवेदनशील स्थिति के बावजूद, मुख्यधारा के भारतीय मीडिया (जिसे अक्सर ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है) पर इस खबर को दबाने या पर्याप्त जगह न देने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी इस पर चुप है? और अगर है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं?

​1. अंतरराष्ट्रीय मीडिया पूरी तरह चुप नहीं है, लेकिन प्राथमिकताएं अलग हैं

​यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस खबर को बिल्कुल नहीं छाप रहा है। पर्यावरण, लद्दाख के मुद्दों और अब शिक्षा सुधारों को लेकर जब भी सोनम वांगचुक कोई बड़ा कदम उठाते हैं, तो वैश्विक प्रेस इन पर नजर रखती है। हालांकि, उनकी कवरेज की गति और प्राथमिकताएं भारतीय दर्शकों की अपेक्षाओं से भिन्न होती हैं।

​2. अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों द्वारा इस मुद्दे को उठाने में चुनौतियां

​वैश्विक मीडिया के भारतीय मीडिया के खिलाफ खुलकर न आ पाने या इस मुद्दे को एक अंतरराष्ट्रीय संकट न बना पाने के पीछे कई भू-राजनीतिक और तकनीकी कारण हैं:

​यह भारत का आंतरिक प्रशासनिक मामला है: नीट परीक्षा में गड़बड़ी और किसी मंत्री के इस्तीफे की मांग (धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग) को अंतरराष्ट्रीय मीडिया भारत का “आंतरिक नीतिगत मामला” मानता है। विदेशी मीडिया आमतौर पर तब तक आक्रामक रुख नहीं अपनाता जब तक कि मामला मानवाधिकारों के बड़े उल्लंघन, युद्ध, या दो देशों के बीच के विवाद से न जुड़ा हो।

​भू-राजनीतिक (Geopolitical) मजबूरियां: वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, पश्चिमी देश और उनका मीडिया भारत को एक बड़े आर्थिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं। विदेशी पत्रकार अक्सर सरकार की नीतियों पर तीखी टिप्पणी करने से बचते हैं ताकि उनके राजनयिक संबंध प्रभावित न हों।

​प्रेस क्रेडेंशियल और वीजा का दबाव: भारत में काम कर रहे विदेशी पत्रकारों या अंतरराष्ट्रीय मीडिया घरानों को सरकारी नियमों, वीजा की शर्तों और रिपोर्टिंग परमिट्स का पालन करना होता है। भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने से उनके भारत में काम करने के अधिकार पर असर पड़ सकता है, इसलिए वे बेहद संतुलित और संभलकर रिपोर्टिंग करते हैं।

​3. मुख्यधारा के भारतीय मीडिया की खामोशी का कारण क्या है?

​आपने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस गंभीर अनशन पर मौन है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

​व्यावसायिक हित और सरकारी विज्ञापन: आज के समय में बड़े मीडिया घरानों का राजस्व काफी हद तक सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर करता है। सरकार के खिलाफ या उसकी नीतियों के विरोध में चल रहे किसी बड़े आंदोलन को दिखाने से उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है।

​एजेंडा-आधारित पत्रकारिता: जनहित के मुद्दों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, और युवाओं का भविष्य) को दिखाने के बजाय, टीआरपी बटोरने वाले राजनीतिक विवादों और सनसनीखेज खबरों को प्राथमिकता दी जाती है।  

​निष्कर्ष और आगे की राह

​सोनम वांगचुक जी का यह अनशन केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य और लोकतांत्रिक जवाबदेही की लड़ाई है। भले ही मुख्यधारा का मीडिया या अंतरराष्ट्रीय प्रेस इसे उस तरह से न दिखा रहा हो जैसा कि दिखाया जाना चाहिए, लेकिन सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकार (Alternative Media) इस आवाज को लगातार बुलंद कर रहे हैं। विपक्ष के नेता और नागरिक समाज भी अब उनके समर्थन में आ रहे हैं।

​लोकतंत्र में जब मुख्यधारा का मीडिया अपना कर्तव्य भूल जाए, तब जनता और सोशल मीडिया की ताकत ही सबसे बड़ा हथियार बनती है ताकि व्यवस्था को जगाया जा सके।

​क्या आप इस विषय पर यह जानना चाहते हैं कि इस आंदोलन को सोशल मीडिया के जरिए वैश्विक स्तर पर कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाया जा सकता है?

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