• उत्तराखंड के संस्कृत ग्रामों के एक वर्ष पूर्ण होने पर सचिव संस्कृत शिक्षा दीपक कुमार ने थाई राजदूत चावनार्ट थांगसुम्फंत से की भेंट; सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा

नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड के सभी 13 जनपदों में संचालित ‘13 जनपद-13 संस्कृत ग्राम’ की ऐतिहासिक पहल के एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर उत्तराखंड सरकार ने संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन और अंतरराष्ट्रीय विस्तार की दिशा में नई पहल की है। संस्कृत शिक्षा, जनगणना एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन सचिव दीपक कुमार ने नई दिल्ली स्थित रॉयल थाई एम्बेसी में भारत में थाईलैंड की राजदूत सुश्री चावनार्ट थांगसुम्फंत से शिष्टाचार भेंट कर उत्तराखंड और थाईलैंड के बीच संस्कृत, रामायण, शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की।

बैठक में सचिव दीपक कुमार ने राजदूत को 10 अगस्त 2026 के महत्व से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि इसी दिन उत्तराखंड के सभी 13 जनपदों में संस्कृत ग्रामों की स्थापना के एक वर्ष पूरे हुए हैं। उन्होंने कहा कि यह पहल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की दूरदर्शी सोच का परिणाम है, जिसका उद्देश्य संस्कृत को केवल शिक्षण संस्थानों तक सीमित न रखते हुए घर-घर तक पहुंचाना और समाज की जीवंत भाषा बनाना है।

संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने वाला पहला राज्य है उत्तराखंड

दीपक कुमार ने कहा कि संस्कृत के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में उत्तराखंड का विशिष्ट स्थान है। वर्ष 2010 में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना। उन्होंने संस्कृत विद्वान एवं संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए जीवन समर्पित करने वाले आचार्य दिनेश चंद्र जोशी की जन्मशती के अवसर पर देशभर में आयोजित कार्यक्रमों की जानकारी भी थाई राजदूत को दी।

उन्होंने बताया कि आचार्य जोशी ने संस्कृत के प्रति जन-जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप उत्तराखंड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा के रूप में मान्यता मिलने की दिशा मजबूत हुई।

रामायण बनेगी भारत-थाईलैंड सांस्कृतिक सहयोग की कड़ी

बैठक में भारत और थाईलैंड की साझा सभ्यतागत विरासत पर भी चर्चा हुई। दीपक कुमार ने कहा कि दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंध अत्यंत प्राचीन और समृद्ध हैं तथा रामायण दोनों देशों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कड़ी है। उन्होंने थाईलैंड की पारंपरिक रामायण प्रस्तुतियों और थाई कलाकारों एवं सांस्कृतिक दलों की भारत यात्राओं को उत्तराखंड की रामलीला परंपरा से जोड़ने का प्रस्ताव रखा।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में कुमाऊँनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषाओं में स्थानीय समुदायों द्वारा रामलीला का मंचन किया जाता है। थाईलैंड की रामायण परंपरा और उत्तराखंड की इन विविध रामलीला परंपराओं को साझा मंच पर लाने से एक अनूठा सांस्कृतिक अनुभव तैयार किया जा सकता है।

संस्कृत विश्वविद्यालयों के बीच शुरू होगा ऑनलाइन संवाद

सचिव दीपक कुमार ने सुझाव दिया कि औपचारिक समझौता ज्ञापन की दिशा में आगे बढ़ने से पहले उत्तराखंड के संस्कृत संस्थानों और थाईलैंड के विश्वविद्यालयों में संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन कर रहे प्रोफेसरों एवं विद्वानों के बीच ऑनलाइन शैक्षणिक संवाद शुरू किया जाए।

उन्होंने थाईलैंड में संस्कृत, पालि एवं भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विश्वविद्यालयों और संस्थानों में संचालित पाठ्यक्रमों एवं शैक्षणिक गतिविधियों का अध्ययन करने का प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आदान-प्रदान से भविष्य में थाईलैंड के प्रमुख विश्वविद्यालयों के साथ संस्थागत सहयोग का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

हरिद्वार में हो सकती है भव्य थाई रामायण प्रस्तुति

बैठक में उत्तराखंड के संस्कृत ग्रामों और थाई रामायण परंपरा को सीधे जोड़ने का प्रस्ताव भी सामने आया। दीपक कुमार ने सुझाव दिया कि आगामी थाई रामायण प्रस्तुति के कलाकारों एवं सांस्कृतिक दल को उत्तराखंड के संस्कृत ग्रामों का भ्रमण कराया जाए।

इसके साथ ही उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय और उत्तराखंड संस्कृत संस्थानम् के सहयोग से हरिद्वार में भव्य रामायण सांस्कृतिक प्रस्तुति आयोजित किए जाने की संभावना भी व्यक्त की गई। उन्होंने कहा कि ऐसी पहल दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सेतु का काम करेगी और उत्तराखंडवासियों को थाईलैंड की विशिष्ट रामायण परंपरा को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर मिलेगा।

थाई राजदूत ने सहयोग का दिया भरोसा

थाई राजदूत एवं डिप्टी चीफ ऑफ मिशन ने उत्तराखंड सरकार की ओर से संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। उन्होंने थाईलैंड और उत्तराखंड के बीच शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं संस्कृत संबंधी सहयोग की संभावनाएं तलाशने में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

संस्कृत से थाईलैंड का रहा है गहरा नाता

थाईलैंड का संस्कृत अध्ययन और संस्कृत विद्या से लंबे समय से गहरा संबंध रहा है। थाई राजपरिवार की राजकुमारी महा चक्री सिरिंधोर्न प्रतिष्ठित संस्कृत विदुषी हैं और उन्हें भारत द्वारा विश्व संस्कृत पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। थाईलैंड ने वर्ष 2015 में बैंकॉक में 16वें विश्व संस्कृत सम्मेलन की मेजबानी भी की थी।

संस्कृत के क्षेत्र में थाई विद्वानों के योगदान को भारत में भी सम्मान मिला है। प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान प्रोफेसर चिरापत प्रपंडविद्या को संस्कृत के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 2022 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वहीं, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से थाईलैंड में संस्कृत के लिए एक चेयर की स्थापना भी की गई है।

बैठक में रॉयल थाई एम्बेसी के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन एवं मंत्री किरण मूंगटिन भी उपस्थित रहे।

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